‘बधाई दो’ मूवी रिव्यू : समलैंगिकता पर जरूरी है दिल की बात कहनी

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‘बधाई दो’ मूवी रिव्यू : समलैंगिकता पर जरूरी है दिल की बात कहनी


फिल्म के एक संवाद में, फिल्म के नायक शार्दुल बहुत हिम्मत जुटा कर कहता है कि हाँ, हूँ मैं समलैंगिक, आप लोग के लिए यह समझना कि यह बात भी नॉर्मल है, बहुत मुश्किल है। दरअसल, मेरा मानना है कि हर्षवर्धन कुलकर्णी की फिल्म ‘बधाई दो’ इस बात पर जोर डालती है कि हिम्मत कर बात करनी जरूरी है, क्योंकि समलैंगिक होना वैसी ही नॉर्मल बात है, जैसी कोई और बात। मेरे नजरिये से कहूँ तो ‘बधाई दो’ का पूरा ढांचा, समलैंगिक को लेकर समाज के बीच हीन दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। अपने समाज में इसे जिस बीमारी और छुआछूत के रूप में देखा जाता है, फिल्म में इस पहलू को उजागर किया गया है। एक बेहद अहम प्रश्न कि क्यों समलैंगिक लोगों को अब भी बच्चे अडॉप्शन के कानून से मंजूरी नहीं मिली है। निर्देशक ने दरअसल, मेरे ख्याल से ‘बधाई दो’ के बहाने कई लेयर्स पर अपनी पैनी कैमरे की नजर को दौड़ाया है, जिसमें उन्होंने दर्शाने की कोशिश की है कि समलैंगिकता को लेकर परिवार में बातचीत होनी कितनी जरूरी है, बड़े मंच पर क्यों इसकी चर्चा जरूरी है, समाज में उनके अस्तित्व को बरक़रार रखना क्यों जरूरी है। निर्देशक ने बिना भाषणबाजी किये, बिना शोर किये, एक नॉर्मल सी बात समझाने की कोशिश की है और सबसे अच्छी बात निर्देशक हर्षवर्धन की यही हैं कि उन्होंने इसे कोई सनसनी मुद्दा नहीं बनाया है। किरदारों को बेवजह अपने नसीब पर कोसते हुए या उन्हें कमजोर नहीं दिखाया है, बल्कि ऐसे समाज में, जो उन्हें सम्मान नहीं देता है, बार-बार उनके अस्तित्व पर प्रहार करता है, ऐसे में आखिर समलैंगिक क्या करें, वह अपने लिए एक दुनिया बसाते हैं ‘लैवेंडर मैरेज’ के रूप में, जिसमें दो समलैंगिक सिर्फ परिवार वालों और समाज की दुनिया में तो पति-पत्नी होते हैं, लेकिन आपस में वह किसी रूम मेट्स की तरह ही रहते हैं। हर्षवर्धन और उनकी लेखन टीम की तारीफ़ होनी चाहिए कि उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण बातें कहते हुए, कुछ भी ऐसे कदम या घटनाएं नहीं गढ़ी हैं, जो समलैंगिकता को नीचा दिखाए, इस टीम की कोशिश बस यही है कि एक ऐसा माहौल हमारे इर्द-गिर्द बनें कि इसे कोई मुद्दा नहीं, बल्कि आम बात समझी जाये और इन्हें कोई हौवा नहीं बनाया जाये। आपके परिवार के बीच ही कोई न कोई ऐसा हो सकता है, यह फिल्म उस आवाज को बुलंद करती है कि वह अपनी बात कह पाए। फिल्म के निर्देशन की यह भी खूबी है कि उन्होंने बड़ी ही खूबसूरती से मीडिल क्लास की बारीकियों को पकड़ा है। एक परिवार में जहाँ 31 की लड़की हो जाने के बाद, शादी के लिए किसी भी लड़के से बाँध देने की बात होती है तो एक लड़का, जो कि पांच बहनों के बीच इकलौता लड़का है, किस तरह अपने परिवार की महिलाओं के दबाव में होता है। राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर को भी इस फिल्म के लिए बधाई देनी चाहिए कि उन्होंने इस फिल्म को हाँ कहा है, चूँकि उनके जैसे मेन स्ट्रीम कलाकारों के आने के बाद ही, ऐसे विषय पर कुछ हद तक ही सही, स्वीकृति शुरू हो सकती है, एक आस तो दिख ही सकती है। दिलचस्प पहलू निर्देशक ने यह भी रखा है कि किरदारों को किसी को डॉक्टर, किसी को पीटी टीचर, किसी को वकील और किसी को पुलिस की भूमिका सौंपी है, ताकि इस रूप में भी समाज के बीच स्वीकृति आ सके कि समलैंगिक होना कोई पाप नहीं है, बीमारी नहीं है और इसके बाद भी आप आम लोगों की तरह ही प्रोफेशन से जुड़े रह सकते हैं। यह फिल्म समाज, आम लोग और देश के कानून को लेकर भी बात करती है कि नजरिये के साथ-साथ कानून का नजरिया भी इन लोगों के प्रति क्यों बदलना जरूरी है। वाकई में, इस फिल्म को देखने के बाद आपको निर्देशकों को बधाई दो कहना चाहिए। फिल्म का क्लाइमेक्स वर्तमान दौर में बनी फिल्मों के सबसे बेहतरीन क्लाइमेक्स में से एक है।

क्या है कहानी

शार्दुल (राजकुमार राव) एक पुलिस ऑफिसर है, जो अपने घर में पांच बहनों के बीच अकेला लड़का है, माँ-बहनें उसकी शादी के लिए परेशान है। लेकिन शार्दुल को पता है कि वह समलैंगिक है और किसी लड़की से शादी नहीं कर सकता है, लेकिन झिझक और शर्म के कारण वह अपने परिवार वालों से अपने मन की बात शेयर नहीं कर पाया है। सुमन( भूमि पेडनेकर) एक पीटी टीचर है और वह भी अपने घर में शादी बार-बार टाली जा रही है। ऐसे में संयोग से शार्दुल और सुमन की मुलाकात होती है, शार्दुल अपने मन की बात सुमन को बताता है और दोनों लैवेंडर मैरेज के लिए तैयार होते हैं। दोनों ही अपनी जिंदगी में खुश हैं, दोनों अपने-अपने पार्टनर के साथ जिंदगी हसीन तरीके से बीता रहे होते हैं, लेकिन जिंदगी में उनके तूफ़ान तब आता है, जब बहुत मशक्क़तों के बावजूद उनके परिवार वालों के सामने उनकी समलैंगिकता की बात सामने आती है। अब ऐसे में समाज की बात तो छोड़िये, क्या परिवार उनकी बात समझ पाता है। आखिर क्यों अपनी खुशियों के लिए उन्हें झूठ का सहारा लेना पड़ता है, बस यह फिल्म अपने मन की बात कहने की बात करता है।

बातें जो मुझे बेहद अच्छी लगीं

फिल्म में निर्देशक ने कोई भी सनसनी फैलाने की कोशिश नहीं की है। यह फिल्म आवाज की बात करती है। एक नॉर्मल सी बात को, जिस तरह से समाज ने हौवा बना दिया है, यह उस बात की फिल्म है। समाज से पहले, खुद से सच कहने की बात है। एक परिवार की नजर देखें तो उन्हें यह खुद के साथ हुआ धोखा नजर आएगा, लेकिन झूठ कहने पर मजबूर भी इस समाज और परिवार ने किया है, यह बात फिल्म दर्शाती है।

  • फिल्म में निर्देशक ने कोई भी सनसनी फैलाने की कोशिश नहीं की है। यह फिल्म आवाज की बात करती है। एक नॉर्मल सी बात को, जिस तरह से समाज ने हौवा बना दिया है, यह उस बात की फिल्म है। समाज से पहले, खुद से सच कहने की बात है। एक परिवार की नजर देखें तो उन्हें यह खुद के साथ हुआ धोखा नजर आएगा, लेकिन झूठ कहने पर मजबूर भी इस समाज और परिवार ने किया है, यह बात फिल्म दर्शाती है।
  • फिल्म में बच्चे के अडॉप्शन को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू रखी गई है कि समाज में अब भी समलैंगिक लोगों के लिए अडॉप्शन की क़ानून की तरफ से मंजूरी नहीं है। ऐसे में फिल्म के नायक-नायिका जो फैसला लेते हैं, यह फिल्म की सबसे खूबसूरत पहलू है।
  • समलैंगिक कोई दूसरे ग्रह के लोग नहीं हैं, आम लोग ही हैं, उन्हें क्यों आपके बस साथ की जरूरत है, इसे फिल्म में बिना किसी शोर-शराबे के प्रस्तुत किया गया है।
  • एक मीडिल क्लास परिवार में लड़के, एक औरत को क्या समझते हैं, उस दकियानूसी सोच को भी खूबसूरती से फिल्म में दर्शाया गया है और एक स्ट्रांग महिला किरदार के रूप में सुमन किस तरह से अपनी शर्तों पर जिंदगी जीती है, उसे भी अच्छे से दर्शाया गया है।
  • फिल्म का  गीत-संगीत भी बेहद कर्णप्रिय है।
  • एक आम इंसानों की तरह ही समलैंगिक लोग हैं, उनके भी इमोशन होते हैं, वह भी दुखी और खुश होते हैं, उनकी भावनाओं का मजाक बना कर, हम किस तरह उन्हें सिर्फ नीचा दिखाते हैं, इस पहलू को भी अच्छे से दिखाया गया है।
  • फिल्म में ह्यूमर के अच्छे सिचुएशन हैं, जो फिल्म में आपको बोर नहीं होने देते हैं।
  • फिल्म का क्लाइमेक्स वर्तमान दौर की सबसे खूबसूरत क्लाइमेक्स में से एक है।
  • बिना नौटंकी, हंगामे, शोर-शराबे और भाषणबाजी और मेलो ड्रामा के बगैर भी इस विषय पर बात हो सकती है, यह फिल्म दर्शाती है।
  • निर्देशक ने कुछ ही दृश्यों के माध्यम से नार्थ ईस्ट के लोगों के प्रति आम लोगों के ख़राब रवैये को भी दर्शाया है

अभिनय

राजकुमार राव ने फिल्म में ऐसे कई इमोशल दृश्य दिए हैं, जो आपकी आँखों में आंसू ला देते हैं, यह उनके करियर की अबतक की सबसे कठिन फिल्मों में से एक है, मेरे नजरिये से और ऐसे किरदार के साथ न्याय करने के लिए राजकुमार से बेहतर और कोई कलाकार हो ही नहीं सकते थे। भूमि पेडनेकर ने भी एक स्ट्रांग लड़की का किरदार, बहुत ही संजीदगी और सहजता से निभाया है। उनके कॉम्प्लेक्स किरदार की सहजता ने आकर्षित किया मुझे, अपनी शर्तों पर जीने वाली ऐसी लड़कियां फिल्मों में लगातार फ्रंट पर आती रहनी चाहिए। फिल्म में दिल जीत ले जाते हैं गुलशन, उनकी एंट्री सीन में बहुत बाद में होती है, लेकिन चंद दृश्यों में ही उन्होंने प्रभावशाली अभिनय किया है। इस फिल्म की शो स्टॉपर शीबा चड्डा रही हैं, उनके किरदार में कई लेयर्स हैं। लवलीन मिश्रा, नितेश पांडे, सीमा पाहवा और बाकी सारे सहयोगी कलाकारों ने फिल्म की कहानी को पूरी तरह से सपोर्ट किया है। गुलशन ने अपने प्रेजेंस से फिल्म में फ्रेशनेस दी है। चम दारंग ने भी सार्थक अभिनय किया है।

बातें जो बेहतर हो सकती थीं

फिल्म के मध्यांतर में थोड़े भटकाव हैं, उससे बचा जा सकता था।

मेरे लिहाज से ऐसी फिल्मों का लगातार बनते रहना जरूरी है, ताकि इस विषय को कोई हौवा नहीं, कोई विशेष दर्जा नहीं, बल्कि आम लोगों की तरह की नॉर्मल नजरिये से देखा जाए। इस पर लगातार ऐसी ही संवेदनशील फिल्में बननी जरूरी हैं।

फिल्म : बधाई दो

कलाकार : भूमि पेडनेकर, राजकुमार राव, सीमा पाहवा, गुलशन दवैया, शीबा चड्डा, लवलीन मिश्रा, नितेश पांडे, शशि भूषण, चम दारंग, दीपक अरोरा

निर्देशक : हर्षवर्धन कुलकर्णी

लेखन टीम : सुमन अधिकारी, अक्षत घिलडाल, हर्षवर्धन कुलकर्णी

मेरी रेटिंग : 5 में से 3. 5 स्टार





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